ترقی یافتہ اور مہذب ہونے کیا مطلب ہے؟

یہ تحریر سہ ماہی تجزیات، شمارہ 100 سے لی گئی ہے۔

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ترقی اور تہذیب کا تصور بظاہر آسان بھی ہے لیکن غور سے تجزیہ کیا جائے تو بیشتر ایسے مظاہر جنھیں ہم ترقی کی پہچان سمجھتے ہیں، تنزل یا ترقیِ معکوس کا حوالہ بھی ہو سکتے ہیں۔ زندگی کے آگے بڑھتے ہوئے سفر میں مادی سہولیات کا تنوع اور فراوانی ترقی کے کس رخ کی خبر دیتی ہیں، اور انھی سہولیات کے باعث انسان کی جذباتی اور نفسیاتی زندگی میں کس نوع کا انحطاط آ سکتا ہے، ایسے سوالات ہیں جن پر بیک وقت غور کرنے سے ترقی اور تہذیب کے معنی متعین ہو سکتے ہیں۔ جمشید اقبال نے دقتِ نظر سے مسئلے کے جملہ پہلوؤں کو اجاگر کیا ہے اور بحث کو نتیجہ خیز بنانے کی سعی کی ہے۔ (مدیر)

آج  سے  کوئی  تین  دہائیاں  قبل  ہمارے  گھر  ٹائپ  رائٹر  آیا  اور  جب  اس  ٹائپ  رائٹر  پرمیرے  سامنے  ایک  خط  ٹائپ  کیا  گیا  تو  میں  نے  سوچا  کہ  اس  سے  بڑی  اور  حتمی  ایجاد  کیا  ہو  سکے  گی۔  بظاہر  جدا  جدا  دکھائی  دینے  والے  حروف  کیسے  کا  غذ  پر  ایک  مطلوبہ  مقام  پر  جاکر  ٹکرا  رہے  تھے  اور  ایک  تحریر  خود  بہ  خود  مرتب  ہوتی  نظر  آرہی  تھی۔  یہ  سب  کسی  جادُو  سے  کم  نہیں  تھا۔  اُس  وقت  کون  کہہ  سکتا  تھا  کہ  یہ  ’حتمی  ایجاد‘  چند  سال  بعد  صرف  کباڑ  خانوں  میں  دکھائی  دے  گی۔  ٹائپ  رائٹر  نے  اپنی  زندگی  کے  آخری  ایام  ہمارے  گھر  میں  نہایت  عزت  و  احترام  سے  گزارے۔  پھر  ایک  دن  آیا  کہ  اُسے  کباڑ  کے  بھاؤ  بیچا  اور  کچھ  پیسے  ڈال  کر  کمپیوٹر  خرید  لیا۔  پھر  کمپیوٹر  بھی  بدلتے  رہے  لیکن  ہم  نے  کسی  بھی  ایجاد  کو  حتمی  کہنے  سے  توبہ  کرلی۔

ٹائپ  رائٹر  کی  جگہ  کمپیوٹر،  پرانے  اور  سُست  رَو  کمپیوٹر  کی  جگہ  نئے  کمپیوٹر  لیتے  تو  دوست  اسے  ترقی  کہتے۔  ہمارے  ہاں  تصور  یہی  ہے  کہ  جب  روایتی  مشین  کی  جگہ  نسبتاً  تیز  اور  فعال  مشین  لے  لے  تو  ہم  اُسے  ترقی  کہتے  ہیں۔  صرف  مشین  ہی  نہیں  درخت  کا  کرسی  بن  جانا،  جنگل  کی  جگہ  ہوٹل  تعمیر  ہو  جانا،  دریا  کا  ڈیم  میں  بدل  جانا،  چراگاہ  کے  دل  میں  کیمیائی  کھاد  کی  فیکٹری  لگ  جانا  بھی  عام  طور  پر  ترقی  ہی  سمجھا  جاتا  ہے۔

تاہم  ترقی  کا  سوال  اس  قدر  سادہ  نہیں  ہے  جتنا  سمجھا  جاتا  رہا  ہے۔

ماہرین  سے  پوچھیں  تو  ترقی  کا  مطلب  کسی  خاص  ثقافت  کا  اپنی  دانش  اور  آفاقی  جوہر  دریافت  کرنے  کے  بعد  اُسے  تقویت  اور  فروغ  دینا  ہے۔  ترقی  زیادہ  سے  زیادہ  لوگوں  کی  بنیادی  انسانی  ضروریات  کی  بتدریج  تسکین  کا  عمل  ہے  اور  اس  میں  شناخت،  اظہار،  جمالیاتی  اور  رُوحانی  ضروریات  کی  تسکین  کی  آزادی  بھی  شامل  ہے۔

ترقی  کے  سوال  کا  جواب  خود  کو  عالمگیر  تصور  کرنے  والی  تہذیبیں  بھی  دیتی  رہی  ہیں۔  کسی  کے  نزدیک  ان  کی  تاریخ،  نظریات  اور  معیارات  کو  آفاقی  سمجھ  کر  اپنانا  دنیوی  اور  کسی  کے  نزدیک  اخروی  زندگی  میں  ترقی  کی  ضمانت  ہے۔  ان  کے  نزدیک  آپ  جس  قدر  ’اُن‘  جیسے  ہوں گے اُسی  قدر  ترقی  یافتہ  کہلائیں  گے(1) ۔  اگر  ترقی  کا  یہ  تصور  اپنالیا  جائے  تو  دنیا  میں  ثقافتی  رنگا  رنگی  (diversity)  کا  خاتمہ  ہوجائے  گا  اور  مختلف  ثقافتیں  اپنی  انفرادی  شناخت  کو  تقویت  اور  فروغ  نہیں  دے  پائیں  گی۔اس  سے  ترقی  کی  یہ  بنیادی  شرط  پوری  نہیں  ہوپائے  گی  کہ  مختلف  ثقافتیں  اپنی  مقامی  دانش  اور  آفاقی  رمق  کو  تقویت  دے  سکیں۔

برٹن  کے  پیش  کردہ  بنیادی  انسانی  ضروریات  کے  نظریے  پر  بات  کرتے  ہوئے  ہم  دیکھتے  ہیں  کہ  انفرادی  شناخت  کا  اظہار،  فروغ  اور  اُسے  تقویت  دینا  امن  اور  ترقی  کی  منزل  کی  جانب  پہلا  اہم  قدم  ہے  کیونکہ  ترقی  کے  ایک  جامع  ماڈل  کے  لیے  ضروری  ہے  کہ  وہ  صرف  بشر مرکز  نہیں  بلکہ  حیات  مرکز بھی  ہو  (2)۔  اس  لیے  دریا  کا  ڈیم  بن  جانا  اور  جنگل  کا  ہوٹل  بن  جانا  ترقی  نہیں  کہلائے  گا  کیونکہ  اس  سے  جنگلی  و  سمندری  حیات  اور  ماحولیاتی  توازن  میں  بگاڑ  پیدا  ہوسکتا  ہے۔ترقی  کے  ثقافتی  اور  ماحولیاتی  پس  منظر  سے  ہٹ  کر  اگر  صرف  معاشی  تناظر  میں  دیکھا  جائے  تو  ترقی  کا  مطلب  خام  قومی  پیداوار  (GNP)  میں  اضافہ  ہے۔

اس  سے  ظاہر  ہوتا  ہے  کہ  ماہرین  ترقی  کے  عام  مشینی  ماڈل  سے  آگے  دیکھ  رہے  ہیں۔مثال  کے  طور  پر  گذشتہ  صدی  کے  دوران  ترقی  کے  جو  ماڈلز  سامنے  آئے  ہیں  ان  میں  سے  ایک  اہم  ماڈل  نوبل  انعام  یافتہ  امرتیا  سن  کا  ماڈل  ہے  جو  مشینوں  کی  بہتات  کی  بجائے  آزادی  کو  ترقی  کا  پیمانہ  قرار  دیتا  ہے۔

امرتیا  سن  کے  نزدیک  ترقی  سے  مراد  اُن  آزادیوں  کا  فروغ  ہے  جن  سے  لطف  اندوز  ہونا  لوگوں  کا  بنیادی  انسانی  حق  اور  ضرورت  ہے۔  ان  کے  نزدیک  معیشت  کا  فروغ  بھی  ترقی  اور  آزادی  کا  اہم  ذریعہ  ہوسکتا  ہے  لیکن  آزادی  کا  دارومدار  کچھ  دیگر  عناصر  پر  بھی  ہے  جن  میں،  مثال  کے  طور  پر  تعلیم  اور  صحت  کی  مساوی  سہولیات،  سیاسی  و  شہری  حقوق،  سیاسی  مکالمے  اور  فیصلہ  سازی  میں  ہر  طبقے  کی  شمولیت  اور  جانچ  پڑتال  کی  آزادی  شامل  ہیں۔  امرتیا  سن  کہتے  ہیں  کہ  ترقی  آزادی  کی  راہ  میں  حائل  تمام  رکاوٹوں  کا  ہٹ  جانا  ہے  تاکہ  غربت،  ظلم  و  زیادتی،  معاشی  استحصال،  باضابطہ  سماجی  محرومی،  عوامی  سہولیات  کا  نظر  انداز  کرنا،  ریاستی  تنگ  نظری  اور  جابرانہ  رویوں  کا  خاتمہ  ممکن  ہوسکے۔  امرتیا  سن  ’ترقی  بطور  آزادی  ‘  (3)  کا  یہ  ماڈل  1999  میں  منظرِ  عام  پر  لائے۔  ان  سے  قبل  بابائے  امن  یوہان  گلٹنگ  بالواسطہ  (ساختی۔  بنیادی  )  تشدد  اور  منفی  و  مثبت  امن  کا  ماڈل  پیش  کرچکے  تھے۔

امرتیا  سن  جن  آزادیوں  کو  ترقی  کہتے  ہیں  یوہان  گلٹنگ  کے  نزدیک  ان  آزادیوں  کے  حصول  کی  راہ  میں  بالواسطہ  تشدد  (Structural  violence)  حائل  ہے۔  بالواسطہ  تشدد  سے  مُراد  ایسے  تمام  تصورات،  قوانین،  رسوم  و  رواج  اور  مقبول    عام  نظریات  ہیں  جو  کسی  فرد  یا  انسانی  گروہ  کے  خلاف  تشدد  یا  نسل  کشی  کے  حق  میں  جواز  کے  طور  پر  پیش  کیے  جاتے  ہوں۔  مثال  کے  طور  پر  اگر  کسی  بچے  کو  تعلیم  حاصل  کرنے  کے  مساوی  مواقع  میسر  نہیں  یا  پھر  کسی  گروہ  کی  وسائل  تک  رسائی  ممکن  نہیں  تو  اس  کی  وجہ  اس  معاشرے  میں  موجود  بالواسطہ  تشدد  ہے۔  جب  تک  معاشرے  کے  رگ  و  ریشہ  اور  اجتماعی  لاشعور  سے  تشدد  کا  باعث  بننے  والے  نظریات  اور  خیالات  صاف  نہیں  ہوجاتے،  معاشرے  سے  نہ  جبر  ختم  ہوسکتا  ہے،  نہ  آزادی  میسر  آسکتی  ہے  اور  نہ  ہی  امن  آسکتا  ہے۔

اگر  امرتیا  سن  کے  ترقی  اور  یوہان  گلٹنگ  کے  امن  کے  ماڈل  کا  مطالعہ  کیا  جائے  تو  ایک  بات  واضح  ہوجاتی  کہ  انسانی  آزادیوں  اور  امن  دونوں  کی  راہ  میں  بالواسطہ  تشدد  حائل  ہے۔  (4)  اس  لیے  اگر  ہم  ان  دونوں  ماڈلز  کو  ملا  ئیں  تو  ہمیں  ’ترقی  بطور  امن  ‘  کا  ماڈل  حاصل  ہوتا  ہے  کیونکہ  ترقی  کا  مطلب  اگر  آزادی  ہے  تو  آزادی  کی  راہ  میں  سب  سے  بڑی  رکاوٹ  بالواسطہ  تشدد  ہے۔

ترقی  بطو  رامن  کا  ماڈل  سمجھنے  کے  لیے  ویل  ڈیورانٹ  کی  ایک  کتاب  میں  پیش  کردہ  ایک  منظر  نامے  سے  مدد  لی  جاسکتی  ہے  جس  میں  مصنف  نے  عہدِ  عتیق  اور  دورِ  جدید  کے  مفکرین  کے  درمیان  ایک  خیالی  مکالمہ  پیش  کیا  ہے۔  اس  منظرنامے  میں  یونانی  فلسفی  ارسطو  کو  جدید  دنیا  کی  سیر  کرائی  جاتی  ہے،  اس  دور  کے  انسانوں  کے  زیر  استعمال  مشینوں  کے  بارے  میں  بتایا  جاتا  ہے۔  ارسطو  کو  یہ  جان  کر  خوشی  ہوتی  ہے  کہ  اس  کے  استاد  افلاطون  کا  نظریہ  جمہوریت  آج  تک  زندہ  ہے  اور  ارسطو  کی  منطق  نے  انسانوں  کو  مشینوں  سے  لیس  کردیا  ہے۔ارسطو  یہ  سب  حیران  ہوکر  سنتا  اور  دیکھتا  رہتا  ہے  لیکن  آخر  میں  میزبان  سے  ایک  سوال  پوچھتا  ہے: ’’ کیا  آج  بھی  انسان  ایک  دوسرے  کو  قتل  کرتا  ہے؟‘‘

’’نہ  صرف  قتل  کرتا  ہے  بلکہ  آج  ہم  ایک  بٹن  دبا  کر  لاکھوں  انسانوں  کو  موت  کے  گھاٹ  اتار  سکتے  ہیں۔  آج  کا  انسان  عہد ِ عتیق  کے  انسان  کی  طرح  پس  ماندہ  نہیں  رہا  جو  دوسرے  انسان  کو  مارنے  کے  لیے  اینٹ،  پتھر،  تیر  یا  تلوار  کا  استعمال  کرے  ‘‘۔  میزبان  خوشی  سے  بتاتا  ہے۔

بوڑھا  فلسفی  یہ  جواب  سن  کر  مایوسی  کے  عالم  میں  کہہ  اٹھتا  ہے:

                ’’اس  کا  مطلب  ہے  ترقی  اور  تہذیب  ہنوز  ایک  خواب  ہے‘‘۔

 کہنے  کا  مطلب  یہ  ہے  کہ  جب  تک  جنگ  اور  تشدد  موجود  ہیں۔  جب  تک  انسان  جنگ  و  جدل  اور  تخریب  کو  مسائل  کا  حل  سمجھتا  ہے۔  جب  تک  تعلیم،  تاریخ  اور  مذہب  کا  کام  تعمیری  کی  بجائے  تخریبی  جذبات  کی  آبیاری  کرنا  ہے۔جب  تک  سائنسی  علوم  اور  ٹیکنالوجی  کی  مدد  سے  نت  نئے  تباہ  کن  ہتھیار  تیار  کیے  جارہے  ہیں۔  جب  تک  ریاستوں  کی  ترجیحی  سرگرمی  جنگ  کی  تیاری  ہے۔  جب  تک  نوجوانوں  کی  تربیت  کا  بنیادی  مقصد  انھیں  صدیوں  پرانی  دشمنیاں  منتقل  کرنا  اور  پھر  فساد  کا  ایندھن  بنانا  ہے ، اس  وقت  تک  تہذیب  اور  ترقی  محض  سراب  کے  سوا  کچھ  نہیں۔

جب  تک  انسان  تخریبی  جذبات  کا  غلام  ہے  اُس  وقت  تک  ہر  نئی  ایجاد  اُس  کی  قوت    تخریب  میں  اضافہ  کرتی  رہے  گی۔  مثال  کے  طور  پر  تخریب  پر  مائل  ایک  نوجوان  کے  ہا  تھ  میں  جب  سمارٹ  فون  یا  انٹرنیٹ  سے  لیس  کمپیوٹر  آتا  ہے  تو  اس  نوجون  کی  تخریبی  صلاحیتیں  کئی  گنا  بڑھ  جاتی  ہیں۔ چونکہ  مشین  جذبات  اور  اقدار  سے  آزاد  (value-free)  ہے  اس  لیے  وہ  یہ  نہیں  دیکھتی  کہ  اس  سے  کیا  کام  لیا  جارہا  ہے۔ اس  لیے  مشین  سازی  سے  بھی  کئی  گنا  اہم  کام  افراد  کی  توانائیوں  کے  نکاس  اور  اظہار  کے  تعمیری  و  تخلیقی  راستے  (outlets)  فراہم  کرنا  ہے۔  اگر  انھیں  اظہار  کے  ایسے  ذرائع  میسر  نہیں  تو  ان  کے  پاس  ایک  ہی  راستہ  بچتا  ہے  اور  وہ  ہے  تشدد  اور  تخریب  کا  راستہ۔  اس  کے  علاوہ  اگر  ہمارے  ترقی  کے  پیمانے  حیات  مرکز  نہیں  اور  ہم  نے  ماحول  کو  اس  قدر  آلودہ  کردیا  ہے  کہ  ہمارے  تتلی  اور  جگنو  جیسے  صاف  دماغ  دوست  ہم  سے  روٹھ  گئے  ہیں  تو  اسے  بھی  ہرگز  ترقی  نہیں  کہا  جاسکتا۔  ترقی  وہ  ہے  جس  میں  انسانی  ترقی  کی  قیمت  ماحول،  گلہری  اور  تتلی  کو  نہ  چکانا  پڑے۔

یوہان  گلٹنگ  سے  پہلے  علم  نفسیات  نے  ہمیں  بتایا  تھا  کہ  انسان  جبلتِ  مرگ  اور  جبلت  حیات  کا  غیرمتوازن  ملغوبہ  ہے۔  وہ  تعمیر  و  تخریب  کی  متزلزل  کیفیت  کا  نام  ہے۔ہماری  جدید  ریاستوں  میں  بھی  تخریبی  جبلتوں  کا  رُخ  متعین  کرنے  کا  کام  تو  کچھ  اداروں  نے  سنبھال  رکھا  ہے  جبکہ  اس  کے  تعمیری  و  تخلیقی  جذبات  کو  ہنوز  اداراتی  سرپرستی  حاصل  نہیں  ہوئی۔  اب  بھی  کچھ  اداروں  کو  محض  انسان  کے  تخریبی  پہلوؤں  میں  دلچسپی  ہے  اور  وہ،  تعمیری  پہلوؤں  کی  قیمت  پر،  تخریبی  جذبات  کی  آبیاری  اور  نمود  میں  دن  رات  مصروفِ  عمل  ہیں۔  ان  اداروں  کا  کام  تشدد  کی  تقلیب  (transformation)  اور  اسے  تعمیری  نکاس  (outlets)  فراہم  کرنا  نہیں  بلکہ  انسان  میں  تشدد  کا  رجحان  بڑھا  کر  اسے  اپنے  مفاد  کے  لیے  استعمال  کرنا  ہے۔

اس  کا  نتیجہ  یہ  نکلا  ہے  کہ  ہم  انسانوں  کو  اظہار  کے  تعمیری  راستے  فراہم  کرنے  میں  ناکام  رہے  ہیں۔  اس  لیے  ہم  دیکھتے  ہیں  کہ  مشینوں  سے  لیس  انسان  آج  بھی  تہذیب  و  تقدیس  کے  نقاب  میں  وہی  کھیل  کھیل  رہا  ہے  جو  وہ  غار،  جنگل  اور  شکار  کے  دور  میں  کھیلا  کرتا  تھا۔  انسان  کو  جدید  ریاست  کا  شہری  بنے  کوئی  زیادہ  عرصہ  نہیں  ہوا۔  اس  لیے  وہ  لاکھوں  برس  کی  شکاری  یادداشتوں  اور  عادات  سے  پوری  طرح  پیچھا  نہیں  چھڑا  پایا۔  اس  کا  نتیجہ  یہ  نکلا  ہے  کہ  یہ  یادداشتیں  اس  کی  اُس  نکیل  کے  طور  پر  استعمال  ہورہی  ہیں  جس  کا  سرا  مفاد  پرستوں  کے  ہاتھ  میں  ہے۔

ہوسکتا  ہے  بعض  لوگوں  کو  اس  سے  قنوطیت  اور  مایوسی  کی  بُو  آئے۔  اس  لیے  کچھ  روشن  پہلوؤں  پر  بھی  نگاہ  ڈال  لیتے  ہیں۔

  اگر  ہم  انسانی  تاریخ  کو  رجائی (optimist) آنکھ  سے  دیکھیں  تو  ہم  فراعینی  مطلق  العنانیت  سے  تہذیب  کا  تیز  و  تند  اور  لہورنگ  سفر  کرتے  کرتے  جمہوریت  اور  انسانی  حقوق  کی  منازل  تک  آن  پہنچے  ہیں۔ ہم  قتل  پر آمادہ  غلاموں (gladiators) کی خونی ’’تفریح  ‘‘  سے  کرکٹ  اور  فٹ  بال  جیسے  مہذب  کھیلوں  کے  ذریعے  فاسد  جذبات  کے  نکاس  کی  راہیں  دریافت  کرچکے  ہیں۔  کل  تک  بھائی  تخت  پر  قابض  ہونے  کے  لیے  بھائی  کے  گلے  پر  خنجر  چلا  تا  تھا  اور  آج  حریف  بھی  انتخابات  میں  ہار  یا  جیت  کا  فیصلہ  خندہ  پیشانی  سے  قبول  کرتا  ہے۔اقوام  کے  وہ  فاسد  جذبات  جن  کے  نکاس  کا  کام  کل  تک  جنگ  سے  لیا  جاتا  تھا  آج  دو  روایتی  حریفوں  کے  مابین  کرکٹ  میچ  یا  عام  انتخابات  سے  لیا  جا سکتا  ہے۔  عام  انتخابات،  سپورٹس  اور  جمہوری  ادارے  معاندانہ (antagonistic) جذبات  کو  مثبت  نکاس  فراہم  کرکے  بیہودہ  جنگوں  کو  مہذب  مقابلوں  میں  بدل  رہے  ہیں۔

پاکستان  کے  بارے  میں  بات  کی  جائے  تو  اس  دور  کا  سب  سے  اہم  سوال  بھی  یہی  ہے  کہ  ہم  اپنے  جوانوں  کی  توانائیوں  کو  اظہار  کے  تعمیری  اور  تخلیقی  ذرائع  کیسے  فراہم  کرسکتے  ہیں  ؟

اس  کا  مختصر  جواب  شکاری  یادداشتوں  اور  گروہی  فکر  سے  جان  چھڑانے  میں  مدد  کرنا  ہے  تاکہ  نوجوان  بالواسطہ  تشدد  کو  پُرامن  تحاریک  کی  مدد  سے  بتدریج  ختم  کرسکیں۔  صرف  اسی  طرح  ایسی  نسلیں  پروان  چڑھائی  جاسکتی  ہیں  جن  کی  نظر  اُن  مقامات  پر  ہو  جہاں  سے  ٹکڑوں  میں  بٹی  انسانیت  کو  ایک  کنبے  کی  شکل  دی  جاسکتی  ہے،  جہاں  سے  آگے  بڑھا  جاسکتا  ہے۔

  تشدد  اور  جنگ  اس  بات  کا  اعتراف  ہے  کہ  ہم  انسانوں  کی  طرح  مسائل  حل  نہیں  کرسکتے  لہٰذا  ہم  درندوں  کی  طرح  لڑیں  گے۔  اس  لیے  حقیقی  ترقی  مشینوں  کی  ریل  پیل  نہیں  بلکہ  نفسیاتی،  داخلی  اور  خارجی  تشدد  سے  آزادی  ہے۔  چونکہ  حقیقی  ترقی  آزادیوں  کا  احترام  اور  تشدد  کی  آگ  کو  ہوا  دینے  والے  تصورات  کا  تدارک  ہے  ؛  اس  لیے  ترقی  صرف  ٹائپ  رائیٹر  کا  کمپیوٹر  میں  بدل  جانا  نہیں،  حقیقی  ترقی  وہ  ماحول  ہے  جس  میں  آدمی  کو  انسان  بننے  کی  آزادی  میسر  ہو۔

حوالہ جات

1۔  یوہان  گلٹنگ

2۔ Not  just  anthropocentric but  life-centred

3۔ Development  as  Freedom (1999)

4۔ ساختی  تشدد (Structural  violence) کو اس کتاب میں باالواسطہ تشدد کہا  گیا  ہے۔

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